Sunday, November 29, 2009

विश्वामित्र ने बनाया था डायनासोर

विश्वामित्र की सृष्टि से जन्म हुआ था डायनासोर का...जी हां, सुनने में ये बात बेहद अजीब लग रही है....लेकिन ये दावा है एक सिद्धसंत का...हिमाचल प्रदेश में कूलू जिले के महायोगी सत्येन्द्र नाथ ने ये दावा किया है कि हिमालय में एक लाख साल पहले डायनासोर और इस तरह के विशालकाय जीव हुआ करते थे...लेकिन वो इस सृष्टि के नहीं थे...बल्कि विश्वामित्र की बनाई सृष्टि के थे...विश्वामित्र की इस सृष्टि से बड़े-बड़े डायनासोर ही नहीं निकले....जेनेटिक इंजीनिरिंग के जरिए विश्वामित्र ने हवा में दौड़ने वाले एक सींग वाले बड़े-बड़े घोड़े बनाए....सैकड़ों पैरों वाले लंबे-लंबे सांप...योगी का दावा है कि लाखों साल विश्वामित्र ही नहीं दूसरे भी कई ऋषियों ने तमाम तरह के जीव पैदा किए थे...जो आकार और स्वभाव में आम जानवरों से एकदम अलग थे...खासकर विश्वामित्र की सृष्टि के जानवर आम सृष्टि के जानवरों से कई गुने बड़े थे....योगी का ये दावा एक लाख साल पहले की पांडुलिपिओं और हिमालय में मौजूद ग्रंथों, पुराणों और लोक कथाओं पर आधारित है...महायोगी सत्येन्द्रनाथ का कहना है कि उनके पास 5200 साल पुराने टाकरी लिपि में लिखे ऐतिहासिक दस्तावेज, ॥यही नहीं उनके पास तंत्र साधना में इस्तेमाल होने वाले 108 लिपि चित्रों का कलेक्शन भी है.... इन्ही के आधार पर महायोगी ने दिया है डायनासोर के जन्म का एक नया जवाब....जिसके बाद यही सामने आ रहा है कि डायनासोर का राज छुपा है हमारे भारतीय ग्रंथों, पुराणों में...और भारतीय ऋषियों-मनीषियों के अकूत ज्ञान भंडार में छिपा है इनके जन्म का राज....महायोगी सत्येन्द्रनाथ के पास उनके गुरू की एक किताब है जिसमें इस बात का जिक्र किया गया है....वो बाकायदा पढ़ कर बताते हैं कि विश्वामित्र ने तरह-तरह के बड़े-बड़े जानवर बनाए थे जो आकार में आम जानवरों से कई गुना बड़े थे। दरअसल विश्वामित्र एक सनकी ऋषि थे। उनकी सनक तब और बढ़ गई जब वशिष्ठ को ब्रह्मर्षि की पदवी दी गई और इसी आधार पर उनका एक बार अपमान कर दिया गया। देवताओं की गाय कामधेनु वशिष्ठ को दी गई। और जब विश्वामित्र उनसे कामधेनु मांगने गए तो उन्होंने इनकार कर दिया। उन्हें कहा गया कि ये हक केवल ब्रह्मर्षि को है। विश्वामित्र ने ठान ली कि वो भी ब्रह्मर्षि बनेंगे लेकिन वो क्षत्रिय थे इसलिए उन्हें ये हक नही दिया गया। इससे क्षुब्ध होकर विश्वामित्र ने एक नई सृष्टि ही बना डाली। कहा जाता है कि ब्रह्मा की सृष्टि को उन्होंने बहुत बड़ी चुनौती दे डाली। गाय के बदले भैंस उनकी ही सृष्टि की देन है। इसी क्रम में उन्होंने डायनासोर जैसे बड़े-बड़े जानवर भी बनाए।

Saturday, August 15, 2009

बिक रहा बापू का घर





















इन तस्वीरों को देखने से शायद ये नहीं लगता कि कभी इस घर में महात्मा गांधी जैसा ‘नंगा फकीर’ भी रहा होगा, लेकिन हकीकत यही है। बात केवल इतनी ही होती तो कुछ गनीमत थी, लेकिन चौकाने वाली बात तो ये है कि इस घर की नीलामी हो रही है। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहान्सबर्ग में 15 पाइन रोड पर स्थित ये मकान अब नीलाम हो रहा है। ये घर 101 साल पुराना है। इस घर में तीन बेडरुम हैं। पिछले 28 साल से इस घर में नैन्सी और जेरॉड बॉल रह रहे थे, लेकिन अब उन्हें ये घर छोड़ना पड़ेगा। गांधी जी 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे और करीब 21 साल तक वे वहीं बैरिस्टर के रुप में काम करते रहे।

Saturday, August 8, 2009

चुभन

दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है
हजारों कोशिशें करता हूं भुलाने की मगर
मेरा जमीर रह-रहकर सवाल करता है,

धंसा खंजर गवाही देता है
मसला कत्ल का है दिखाई देता है
मगर साबित कौन करेगा
साजिशों के शिकंजों से लड़कर सच को
आज भी सच भी डरा-डरा दिखाई देता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है ,

पीटती हैं लोहे की छड़ें मेरे बदन को
एक चीखता शोर कल से चौराहे पर सुनाई देता है
मैं भागता हूं रात के पिछले पहर से ही बदहवास होकर
हर शख्स का चेहरा मुझे कातिल दिखाई देता है
सिसकती है जिंदगी कारखानों की गिरफ्त में
सड़क के फुटपाथ पर मजदूर नीलाम होता है
पूछता हूं जब तमाशबीनों की भीड़ से वक्त के बारुद का पता
तो हर हादसा मुझे श्मशान का गुमनाम पता देता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है,

गर्म है पत्थर पीरों की दरगाहों पर
पैगम्बर के खून में उबाल आता है
रोती है चादर पड़ी मजारों पर
जब नबी को जिंदा जलाया जाता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है ।

- विधु शेखर उपाध्याय
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

पहली अंगड़ाई से लेकर आखिरी जम्हाई तक...
















सुबह की पहली अंगड़ाई से लेकर
रात की आखिरी जम्हाई तक
सपने को हकीकत समझ
हर आदमी सोता है एक कुंभकर्णी नींद,

ढोल-नगाड़े बजते रहते हैं
जिनकी जहरीली धुनों पर नाचता जाता है वो
नींद में ही, मदारी के बंदर की तरह,

खतरनाक बम धमाकों की आतिशबाजी
और उसके बाद फैले मांस की सड़ांध से भी
नींद नहीं टूटती उसकी,

पानी की तरह हजारों गैलन खून
फेंके जाते हैं मुंह पे उसके
तो भी नींद नहीं खुलती उसकी,


गांधी छाप वाले कई मच्छर-ततैये और बर्र
छोड़े जाते हैं उसकी नाक में....
तब जाके नींद खुलती है उसकी,

और नींद खुलते ही रावण जैसा कोई भाई
मरवा देता है उसे किसी राम के हाथों !

ये प्यास है बड़ी.....!

''ऐ...ऐ'' ''...???...!!!!'' ''ऐ....ओ............मुझे भी चाहिए......मैं भी पिऊंगा.......!'' कानों में पड़ी ये मासूम आवाज एक बच्चे की थी....अपने कॉलेज के सामने खड़ा विकी गटागट कोल्ड ड्रिंक गटक रहा था....कि तभी इस बच्चे की आवाज से वो हड़बडा़ गया...वो बच्चा केवल बोल ही नहीं रहा था, बल्कि विकी की लो वेस्ट जींस भी पकड़ कर खींच रहा था....मतलब बच्चा इस बड़े बच्चे पर पूरी तरह हावी होने की कोशिश में था....वो भी वो बच्चा जिसे विकी ने पहले कभी देखा भी नहीं था,....नहीं, नहीं,....वो भिखारी भी नहीं था......कपड़े उसने ठीक-ठाक पहन रखे थे....बाल भी कढ़े हुए थे...रंग भी काला नहीं था....हड़ब़डाहट में मुंह में भरा हुआ कोल्ड ड्रिंक जिसे विकी अभी कुछ देर और मुंह में ही रखना चाहता था....लेकिन बच्चे ने उसे वो गटकने पर मजबूर कर दिया....गटकते ही विक्की के मुंह से कोल्ड ड्रिंक की कुछ बूंदों की तरह ही शब्द भी निकले - ''क....क्क्या चाहिए ? ''....बच्चा जैसे इसके लिए एकदम तैयार था, ''वही जो पी रहे हो अकेले, अकेले.....मुझे भी दो...''.....विकी से न देते बन रहा था और ना ही ना देते....अभी उसने एक दोस्त से कोल्ड ड्रिंक की ये आधी भरी बोतल झटकी थी....तब इस बच्चे की नजर उस पर पड़ गई थी.....खैर, विकी को लगा उस बच्चे की प्यास उसकी प्यास से बड़ी है....सो उसने धीरे से बोतल पकड़ा दिया....उधर से तेजी से हॉर्न बजाती बस भी विकी के सामने आकर खड़ी हो गई.....बच्चा उसे किसी विज्ञापन फिल्म के नायक की तरह अंगूठा दिखाता चला गया........

Friday, August 7, 2009

ये साजिश है या कुछ और...?

खामोश हो गई है
मुर्गे की बांग,

अब सुनाई नहीं देती
सुबह की अजान,

सूरज भी अलसाता है अब
चेहरा दिखाने से,

मंदिर में भजन भी अब
होने लगे हैं देर से,

सब हो गए हैं किसी की
साजिश के शिकार।

Wednesday, August 5, 2009

बारुदी सुरंग से गुजरता लोकतंत्र

बारुदी सुरंग से गुजरता
लोकतंत्र
चिल्ला रहा है माइक पर -
"आओ मेरे पीछे चले आओ
विकास के पथ पर
आगे बढ़ने के लिए....!"


(२० फरवरी २००५ को लिखी थी मैंने...)