Sunday, July 5, 2009

खुश हो गए सारे के सारे समलैंगिक !

तारीख ०२ जुलाई.....सुबह सुबह टीवी ऑन किया....ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी...समलैंगिकता अब अपराध नहीं...दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकों को दे दी मान्यता...मन तो किया टीवी फोड़ दूं.....ऑफिस गया तो वहां का भी माहौल इस खबर से खासा प्रभावित था। हर बंदा दूसरे को बधाई दिए जा रहा था, मेरा मतलब हर लड़का दूसरे लड़के को, और हर लड़की दूसरी को.....! दूसरे दफ्तरों का भी यही हाल था।...कोई कह रहा था...''अबे अमित, खुश तो बहुत होगा तू आज'', किसी के अल्फाज थे- ''ओए गौरव, अब तो कोर्ट की भी परमिशन मिल गई..." टीवी पर बहस-मुबाहिसों का दौर जारी था। हर चैनल पर तीन-चार बुद्धि के भसुर लोग बैठ के बौद्धिक जुगाली किए जा रहे थे। मैंने जान-बूझकर उस दिन इस मुद्दे पर कोई प्रोग्राम नहीं बनाने का फैसला लिया।....और लालगढ़ से आई एक एक्सक्लूसिव स्टोरी पर लग गया। लेकिन मन में लगातार ये सवाल कोच रहा था, मैं इस फैसले से खुश हूं या नाखुश ?....महसूस तो यही हो रहा है कि मुझे लगता है इसे अपराध के दर्जे से नहीं निकालना चाहिए था.....क्योंकि अब तक तो केवल लड़कियों के बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हो रहा था, अगर इस तरह का कोई कानून बन गया तो लड़कों के साथ बलात्कार की वारदातें बढ़ जाएंगी.....मां-बाप को अपनी बेटों ही नहीं बेटों की इज्जत के लिए फिक्रमंद होना पड़ेगा....क्योंकि जिस तरह से किसी लड़की के साथ सेक्स करने के बाद उसे आपसी सहमति से किया गया सिद्ध करना मुश्किल नहीं है.....उसी तरह किसी लड़के के साथ अप्राकृतिक सेक्स को भी आपसी सहमति से किया गया साबित कर दिया जाएगा......(क्रमशः)

Saturday, June 27, 2009

आदमी अकेला होता है......................

लोगों की इस भीड़ में
आदमी अकेला होता है,
तन्हा जगता है वो
और तन्हा ही वो सोता है,
जाने क्या पाने की चाह में
सुख-चैन अपने खोता है,
लोगों की इस भीड़ में
आदमी अकेला होता है,
एक-दूसरे से मिलने का
उसे वक़्त नही होता है,
नोट कमाने की चाह में
ख़ुद से करता समझौता है,
फारवर्ड होने के नाम पर
सारी नैतिकताएं खोता है,
लोगों की इस भीड़ में
आदमी अकेला होता है,
सोचता कुछ और है वो
और कुछ और उससे होता है,
धर्म का निर्वाह करना
उसे नागवारा होता है,
शराब और पार्टीस ही
उसका सहारा होता है,
लोगों की इस भीड़ में
आदमी अकेला होता है |

Thursday, April 9, 2009

खो गया है दिल इन कविताओं की तरह....

माफ करना

देखकर हुस्न तेरा ग़र हो जाऊं शायर-दीवाना
तो माफ करना।
बंधके खिंचा चला आऊं तेरे सदके पे बार-बार
तो माफ करना।
हो जाए ग़र इश्क तुझे हौले-हौले मुझसे
तो माफ करना।
उड़ जाए नींद रातों की तेरी ग़र मुझसे
तो माफ करना।
बेचैन है ये दिल-ए-नादां ग़र थाम लो लगाम
तो अच्छा, ख़ता हो जाए वरना
तो माफ करना।


छुपाकर दर्द अपना कांटों में खुशबू बिखेरना आता है।
गैर तो गैर अपने भी गर ना समझें तो मरहम लगाना आता है।।

हम पर तोहमत लगाने से पहले झांक लो जरा अपने जिगर में भी।
ग़र शूल शेष हों दामन में, सजा दो चेहरे पे मेरे वो भी।।

कभी-कभी यूं भी हमने, ग़म ही ग़म उठाए हैं।
पीकर एक-एक घूंट आंसू का, औरों को खुशी दिलाए हैं।।

कहां गई मेरी कविताएँ...

इसीलिए...

कुछ चाहने की क्षमता नहीं है
इसीलिए मांगना पड़ता है उसे
बैठे रहने की क्षमता नहीं है
इसीलिए दौड़ना पड़ता है उसे
सांस लेने की क्षमता नहीं है
इसीलिए 'कुत्ता' बनना पड़ता है उसे
रो पाने की क्षमता नहीं है
इसीलिए ठहाके लगाना पड़ता है उसे
'देख लेने' की क्षमता नहीं है
इसीलिए पहरा देना पड़ता है उसे
मर जाने की क्षमता नहीं है
इसीलिए झूम-झूम जीना पड़ता है उसे !



प्रिये महिमामयी !

चांद-सी शीतल दृष्टिमयी
ममता-प्रेम-करुणा की धामयी
मंद-सुगंध पवन-सी प्रवाहमयी
वीणा वाणी है प्रबल ओजमयी।

दृष्टि बिम्ब में कर अंकित
श्रवण-बेलों में हो सशंकित
रूप-माधुर्य की स्वर्णिम बेला में
दिनकर की तुम लावण्यमयी।

हो बखान का तेज का तेरे
किन शब्दों में ओ तेजमयी!
होकर विभ्रम श्रांतमय
कर सका जो मैं इतना रोषमयी

दिवस रैन कबहुं नहीं चैन
बिन देखे सूरत तेरी प्राणमयी
निश्छल उर के मंदिर में
वास है तेरी मूर्ति हे देवमयी !



मां, मैं नहीं आ रही...

मां!
ये धमाके की आवाज कैसी
गर्मी के मारे
दम घुट रहा है मेरा और ये हलचल कैसी ?

मां!
ये 'अल्ला कौन भगवान कौन,
अरे मेरा क्या अपराध?
क्यों पीट रहे हो ?
मैं मर जाऊंगी,
और ये क्या पर्वतनुमा-
नुकीली चीज नहीं खाना मुझे,

मां!
बाहर क्या हो रहा है,
क्या दुनिया जल रही है?
क्योंकि-
मुझे बहुत तेज जलन हो रही है,

मां!
अब मैं दुनिया में नहीं आ रही हूं
दुनिया बहुत बुरी है!

कहां गई मेरी कविताएँ....!

(पिछले कई महीनों से कविताएँ लिखना बिल्कुल बंद है....अब तक जो लिखी हैं वो कम से कम ब्लॉग पर प्रकाशित कर दूं, यही सोचके लिख रहा हूं)


काश !

क्या कहूं
क्या ना कहूं
इस व्यथित उर की व्यथा,
सोचता हूं काश ! मैं
भ्रमर होता
इठलाता फूलों के मुख पर
कह देता मन की कथा,
काश! मैं वो पुष्प होता
कर-कमल का साथ पा
महक जाता
और गाता वीथि-गाथा,

काश! मैं
होता समर्पित
मंदिरों के वक्ष पर
गूंथा जात जो मुझे
प्रेयसी के केश में
खिलखिलाता हो सुगंधित
और कहता प्रेम-गाथा।



नौकर

वह रोज
चुपचाप आता है
साफ करता है जूठे बर्तन और घर
भरता है पानी और सुबह-सुबह हमारा पेट।

गालियों-घुड़कियों को सहज ही सह लेता है
पचपन की उम्र में भी-
अपने पीठ-दर्द की ही तरह
ककहरा तक नहीं जानता
शायद इसीलिए-
बाप-दाद की उम्र का होकर भी
हमें अपना माई-बाप समझता है....



पानी


पानी-
बोतल में हो
या तालाब में
अस्थिर ही होता है,
पकड़ो तो भी हलचल,
छोड़ो तो भी हलचल,
लेकिन-
इसमें प्रवाह न हो तो
सड़ने लगता है,
पनपने लगते हैं कीड़े
जो-
वाहक होते हैं भयंकर रोगों के-
किसी संकीर्ण मन की
कुंठित निराशा की तरह।



समंदर

समंदर
अपनी चंचल लहरों और
उफनते ज्वार के भीतर
असीम गहराई समेटे
अनंत आकाश की ऊंचाई को
प्रतिबिंबित करता है,
निर्वात में उसके
बहुमूल्य रत्नादि भर लेता है
फिर भी
आकाश को छूने को ही
सदा क्रियाशील रहता है।

5

इंसान की मजबूरी

मैं भी जनरल बोगी की दुर्गंध में बैठ
रेल-दुर्घटना का शिकार होना चाहता हूं,
चाहता हूं मैं भी भूख से बेहाल होकर
कंकर-पाथर फांकना,
पहनकर घूमना चाहता हूं कपड़े के नाम पर
केवल एक चिथड़ी कमीज और नेकर,

लेना चाहता हूं एक निःशंक नींद
चौराहे के फुटपाथ पर,
चाहता हूं मैं भी गरियाया जाऊं
छुट्टी मांगने या
चम्मच ठीक से साफ न कर पाने पर,
....और भी बहुत कुछ है जो-
मैं चाहता हूं, ताकि
लिख सकूं एक कविता
इंसान की मजबूरी पर।

और जूते मारो....एक से कुछ नहीं होने वाला...तब तक मारो जब तक सुधर न जाएं...

''जूता मारो स्सालों को....एक जूते से कुछ नहीं होने वाला, जूतों की माला पहना दो...ये सब के सब इसी लायक हैं...'' कुछ ऐसा ही कहना चाहते हैं सिख समुदाय के उत्तेजित लोग। और सरकार उनकी नाराजगी प्रेशर कुकर की तरह टाइटलर का टिकट काटकर कुछ देर के लिए निकाल देना चाहती है। और उसके बाद अंदर ही अंदर प्रेशर कुकर में पकती रहेगी सियासी खिचड़ी। इसकी गंध जब तक फैलेगी तब तक बाहरवालों के पास सिवाय हाथ झाड़ के अपने-अपने घरों में दुबकने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। पहले तो सीबीआई ने जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दे दी...लेकिन जब सरकार ने देखा कि जनता तो भड़क रही है भाई, अब तो कुछ इलाज करना पड़ेगा, वरना चुनाव के इस सीजन में कहीं लेने के देने न पड़ जाएं।...तो बस जुट पड़ी है सरकार जनता को एक बार फिर अपनी सियासी लीला दिखाने और मूर्ख बनाने....!

Saturday, March 28, 2009

कटुआ कहने में खराबी का है भाई!

कटुआ कहने में खराबी क्या है भई....जो वो हैं वही तो कहा है वरुण गांधी....ये गाली कहां से हो गई जो न्यूज चैनलों पर इस शब्द के आने पर लंबी बीप लगा दी जा रही है, अरे जब किसी को डायन कहे जाने पर किसी को आपत्ति नहीं हुई.....किसी को काफिर कहे जाने पर आपत्ति नहीं हुई तो फिर कटुओं को कटुआ कहने पर गां....में मिर्च काहे लग रही है भाई...आम बोलचाल में कितनी ही बार अपने मुसलमान दोस्तों को कटुआ बोल देते हैं लेकिन उनको कोई चिढ़ नहीं मचती...फिर इस शब्द पर इतनी हाय-तौबा क्यों..........ये अल्फाज मेरे अपने नहीं है....कहीं किसी के श्रीमुख से सुनी है, लेकिन इन शब्दों ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर ही दिया। आखिरकार वरुण गांधी पर इतना बवाल क्यों मचा ? मेरे हिसाब से तो अब जाहिर ही है...पूरा का पूरा प्रकरण चुनावी स्टंट है...इस बार के चुनाव में बीजेपी के पास कोई मुद्दा तो है नहीं, राम मंदिर का मुद्दा है नहीं, महंगाई कम हो ही गई...फिर आखिर वो सरकार को घेरे तो कैसे घेरे, इसलिए उसने एक बार फिर हिंदुओं के दबे हुए आक्रोश को भुनाने का प्लान बनाया। और प्लान के तहत ही वरुण गांधी ने ये भड़काऊ भाषण दिया और अपने मीडिया मित्रों के सहारे रातोंरात बीजेपी के स्टार प्रचारक बन गए...अब हालत ये है कि बीजेपी और हिंदुत्व के समर्थक वरुण गांधी के झंडे तले इकट्ठे होने लगे हैं। जाहिर है इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा। यही नहीं वरुण गांधी को बाकायदा सरेंडर करवा कर बीजेपी ने वरुण की टीआरपी और बढ़ा दी है...बुद्धिजीवी वर्ग इस पूरे प्रकरण की निंदा कर रहा है...लेकिन जिस वर्ग को वोट देने जाना है वो तो वरुण गांधी पर फिदा हो गई है।